जीवन परिचय

तथागत बुद्ध, महात्मा फुले, साहू महाराज और डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित एक समतामूलक और सामाजिक योगदान से परिपूर्ण

 जीवन निर्माण की कहानी

         

 राजेन्द्र बौद्ध का जन्म 10 नवम्बर 1985 को राजस्थान राज्य के कोटा जिले के रामगंजमंडी ग्रामीण क्षेत्र में हुआ। यह क्षेत्र ‘कोटा स्टोन’ के उत्पादन और व्यापार के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।

उनके पिता का नाम उपासक बाबूलाल, और माता का नाम उपासिका चमेली बाई है पिता जो पेशे से पशुपालक किसान थे। जो पशुओं की देखभाल करके दूध, दही, कंडे बेचकर परिवार की आजीविका चलाते थे। राजेन्द्र बौद्ध का जन्म एक सीमित संसाधनों वाले, छोटे-से घर में हुआ था।

राजेन्द्र बौद्ध को बचपन से ही चित्रकला में विशेष रुचि थी, जो समय के साथ उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गई रामगंजमंडी की सादगी भरी गलियों में पले – बढ़े

राजेन्द्र बौद्ध ने कला को केवल रंगों और आकृतियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक चेतना का माध्यम बनाया। यही कारण है कि उनका यह व्यवसाय आज भी ईमानदारी, कलात्मकता और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामगंजमंडी के महावीर बाल विद्या मंदिर स्कूल और राजकीय माध्यमिक विद्यालय से प्राप्त की।  विद्यार्थी जीवन में ही वे एक गंभीर, अनुशासित और विचारशील छात्र के रूप में पहचान बनाने लगे थे।

 उनके माता-पिता ने उन्हें न केवल शिक्षा की ओर प्रेरित किया, बल्कि जीवन में नैतिकता, श्रम और विवेक का महत्व भी सिखाया। विशेष रूप से उनके पिता, उपासक बाबूलाल जी ने उन्हें करुणा और सहनशीलता का पाठ पढ़ाया, जो उनके सार्वजनिक जीवन की एक स्थायी विशेषता बनी। “विद्यालय की छोटी-सी पाठशाला में बैठा वह छात्र, जो समानता की कल्पना करता था — वह आज समाज को न्याय और बौद्ध धम्म की दिशा में संगठित कर रहा है।

महज 13 वर्ष की आयु में, जब अधिकांश बच्चे खेल और मनोरंजन में डूबे रहते हैं, तब राजेन्द्र बौद्ध ने कुछ विचारशील साथियों के साथ मिलकर “अम्बेडकर सेवा समिति, रामगंजमंडी” की स्थापना की। यह कार्य उन्होंने मान्यवर श्री रजनीश चंदेल और अन्य युवाओं के सहयोग से किया। समिति का संरक्षक मान्यवर श्री रामगोपाल राजा साहब को बनाया गया तथा जिला अध्यक्ष के रूप में सुनील सरसिया (पप्पू) को सर्वसम्मति से नियुक्त किया गया। यह समिति कोई साधारण संगठन नहीं था यह सामाजिक चेतना की एक चिंगारी थी, जिसने अपने समय में अंधविश्वास, पाखंडवाद और रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध संगठित जागरूकता अभियान चलाया। समिति का उद्देश्य था – समाज के उस अंधकार को मिटाना, जो ज्ञान और समानता के प्रकाश को ढकने का प्रयास करता है।

राजेन्द्र बौद्ध का यह कदम उनके जीवन का पहला सार्वजनिक सामाजिक कार्य था, लेकिन यह बहुत कुछ संकेत करता था समिति के माध्यम से उन्होंने जन-जागरण, विचार गोष्ठियों, बौद्धिक संवाद और अम्बेडकरवादी साहित्य के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया। छोटी उम्र में इस प्रकार का नेतृत्व उनकी दूरदर्शिता, वैचारिक स्पष्टता और साहसिक व्यक्तित्व को दर्शाता है। यह कहना अनुचित न होगा कि राजेन्द्र बौद्ध का सामाजिक नेतृत्व, नारा या भाषण से नहीं, बल्कि अनुभव, तिरस्कार और संघर्ष से जन्मा था।

1 जनवरी 2006 को राजेन्द्र बौद्ध द्वारा अपने जन्मस्थान रामगंजमंडी ग्रामीण को छोड़कर कोटा शहर को कर्मभूमि बनाना, उनके जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। यह केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं, बल्कि शोषित-वंचित समाज के हक़ और सम्मान की लड़ाई को नए स्तर पर ले जाने का संकल्प था। कोटा पहुँचकर उन्होंने वर्ष 2008 मे भारतीय जन कल्याण परिषद कोटा मे संघठन बनाकर बहुजन समाज को संगठित किया, जिसके जिला अध्यक्ष मान्यवर विनय नरवाल को बनाया गया ओर जिला महासचिव मान्यवर राजेन्द्र बौद्ध बने जिन्होंने सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ को तेज़ किया और पीड़ित वर्गों के लिए संघर्ष की एक मजबूत नींव रखी। यह कदम आगे चलकर बहुजन आंदोलन को नई दिशा, नई ताक़त और व्यापक पहचान देने वाला सिद्ध हुआ।

राजेन्द्र बौद्ध जी का वैवाहिक जीवन एक सशक्त जीवन दर्शन का उदाहरण है।

उनका विवाह 24 मई 2010 को हुआ, जो न केवल दो व्यक्तियों का मिलन था, बल्कि दो विचारधाराओं और समान मूल्यों वाले साथियों की यात्रा का आरंभ भी था। यह संबंध श्रद्धेय मोहन लाल जी एवं माता गुड्डी बाई, निवासी प्रेम नगर, कोटा की सुपुत्री पूनम द्रविड़ जी के साथ संपन्न हुआ। पूनम द्रविड़ जी विचारशील और संवेदनशील महिला हैं, जो न केवल अपने पारिवारिक दायित्वों का समर्पण भाव से निर्वहन करती हैं, बल्कि सामाजिक सरोकारों में भी गहरी भागीदारी रखती हैं। वे सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को लेकर हमेशा जागरूक रही हैं।

राजेन्द्र बौद्ध जी के सामाजिक जीवन में पूनम द्रविड़ जी की भूमिका एक सखा, साथी और सहचर के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वे हर मोर्चे पर उनके साथ खड़ी रही हैं—चाहे वह सामाजिक आंदोलनों का संघर्ष हो, जन-जागृति के अभियान हों, या फिर संविधानिक अधिकारों के लिए जारी आंदोलन। पूनम द्रविड़ जी की संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना ने राजेन्द्र जी को लगातार प्रेरित किया, उनका मनोबल बढ़ाया और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें संयम और साहस के साथ आगे बढ़ने की शक्ति दी।

इस वैवाहिक जीवन की बुनियाद केवल पारिवारिक प्रेम पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, आदर, और समान ध्येय पर टिकी हुई है। दोनों ही जीवन साथी डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर और भगवान बुद्ध के सिद्धांतों—करुणा, समता, और प्रज्ञा को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं। उनका वैवाहिक जीवन एक आदर्श है उन सभी युवा दंपतियों के लिए जो न केवल जीवन में साथ चलना चाहते हैं, बल्कि समाज के लिए भी कुछ सार्थक करना चाहते हैं। राजेन्द्र बौद्ध और पूनम द्रविड़ जी का यह संबंध यह दर्शाता है कि जब दो समान विचारधारा वाले लोग साथ आते हैं, तो वे न केवल एक-दूसरे का जीवन संवारते हैं, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा देने में सक्षम हो जाते हैं।

धम्म दीक्षा – संपूर्ण परिवार बुद्ध के मार्ग पर ऐतिहासिक प्रवेश

(21 जुलाई 2021 – परिवार सहित बौद्ध धर्म ग्रहण)

21 जुलाई 2021 का दिन न केवल राजेन्द्र बौद्ध जी के जीवन में बल्कि उनके पूरे परिवार के इतिहास में एक क्रांतिकारी और पवित्र परिवर्तन का प्रतीक बन गया। इस दिन उन्होंने अपनी पत्नी पूनम द्रविड़, पुत्रियां नीलम और आयुषी, के साथ मिलकर बौद्ध धर्म को अपनाया। यह परिवर्तन किसी परंपरा या आस्था का त्याग नहीं था, बल्कि मानवता, समता और विवेक का आलोकमय वरण था। धम्म दीक्षा का यह ऐतिहासिक क्षण और  फिर उनके परिवार ने बुद्ध, धम्म और संघ की शरण लेकर त्रिशरण व पंचशील की प्रतिज्ञाएं लीं।

इस दौरान राजेन्द्र जी ने अपने पुराने नाम ‘राजेन्द्र सिंह पंवार’ का त्याग कर एक नए विचार, नई चेतना और नई सामाजिक पहचान को अंगीकार करते हुए ‘राजेन्द्र बौद्ध’ नाम धारण किया। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं, बल्कि बंधनमुक्ति और मानवीय गरिमा की पुनर्प्राप्ति का प्रतीक था। उसी क्षण उनका पूरा परिवार भी अपने-अपने नामों के साथ बौद्ध विचारधारा का हिस्सा बन गया—जहां कोई जाति नहीं, कोई भेदभाव नहीं, केवल करुणा और समता का मार्ग है।

यह निर्णय वर्षों के सामाजिक अनुभव, चिंतन, अध्ययन और जागरूकता का परिणाम था। डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में आरंभ किया गया धम्म आंदोलन, अब नए युग में राजेन्द्र बौद्ध जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं के माध्यम से आगे बढ़ रहा है। राजेन्द्र जी और पूनम जी दोनों ही सामाजिक न्याय और बौद्ध मूल्यों के लिए वर्षों से कार्य कर रहे थे, परंतु इस निर्णायक कदम ने उनके विचारों और जीवन मूल्यों को कर्म के केंद्र में स्थापित कर दिया। बच्चों—नीलम, आयुषी और आदित्य—को कम उम्र से ही समतामूलक और वैज्ञानिक सोच से जोड़ना एक नवपीढ़ी निर्माण की दिशा में महान प्रयास है। यह धम्म दीक्षा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक नई चेतना का आरंभ है।

यह धर्म परिवर्तन था—वंचित से जागरूकता की ओर, पीड़ा से प्रज्ञा की ओर, और पहचान से गरिमा की ओर।

राजेन्द्र बौद्ध जी के शब्दों में :

“हमने जातिवादी बंधनों को त्यागा है, नफरत को छोड़ा है, और अब बुद्ध के करुणामय मार्ग पर चलने का संकल्प लिया है। हमारा जीवन अब धम्म के लिए है, समाज के लिए है, और समता के लिए है।”

जनसेवक राजेन्द्र बौद्ध
जन जन के प्रिय...राजेन्द्र भैया